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पत्रकारों की सुरक्षा पर संकट: क्यों ज़रूरी है पत्रकार सुरक्षा कानून?
`पत्रकार ममता गनवानी की कलम से` ✍🏻
भोपाल। देश में पत्रकारों पर बढ़ते हमलों के चलते पत्रकार सुरक्षा कानून लाने की मांग जोर पकड़ रही है। लोकतंत्र के चौथे स्तंभ के रूप में पहचाने जाने वाले पत्रकारों पर हो रहे हमले न केवल प्रेस की स्वतंत्रता पर खतरा पैदा कर रहे हैं, बल्कि लोकतांत्रिक व्यवस्था को भी कमजोर कर रहे हैं।
*बढ़ते हमलों से पत्रकारिता पर खतरा*
हाल के वर्षों में पत्रकारों पर हमले और उन्हें डराने-धमकाने की घटनाओं में अप्रत्याशित वृद्धि हुई है। कई पत्रकारों को उनकी निष्पक्ष रिपोर्टिंग के कारण निशाना बनाया गया, कुछ को झूठे मुकदमों में फंसाया गया, तो कुछ की हत्या तक कर दी गई। यह स्थिति दर्शाती है कि आज पत्रकारिता एक जोखिम भरा पेशा बन चुका है।
*पत्रकार सुरक्षा कानून की आवश्यकता*
देश के कई हिस्सों में पत्रकार सुरक्षा कानून की मांग उठ रही है, लेकिन सरकार हर बार इस मुद्दे से कन्नी काटती रही है। महाराष्ट्र और छत्तीसगढ़ जैसे कुछ राज्यों ने अपने स्तर पर इस दिशा में कदम उठाए हैं, लेकिन राष्ट्रीय स्तर पर अब तक कोई ठोस कानून नहीं बनाया गया है।
*निष्पक्ष पत्रकारिता की सजा?*
सवाल यह है कि क्या निष्पक्ष पत्रकारिता करने की सज़ा के रूप में सच की आवाज़ दबाने की शक्ति सत्ताधारियों के हाथ में होगी, या फिर पत्रकार अपनी कलम की ताकत से भ्रष्टाचार की जड़ों को काटने में सक्षम होंगे? यह एक बड़ा सवाल है, जिसका उत्तर भविष्य के गर्भ में छिपा है। लेकिन यह स्पष्ट है कि यदि पत्रकारों को सुरक्षा नहीं दी गई, तो लोकतंत्र की यह मज़बूत नींव धीरे-धीरे कमजोर हो सकती है।
*समाधान की दिशा में कदम*
पत्रकार संगठनों और मानवाधिकार कार्यकर्ताओं ने सरकार से पत्रकार सुरक्षा कानून लाने की मांग तेज कर दी है। उनका कहना है कि यदि पत्रकार सुरक्षित नहीं रहेंगे, तो स्वतंत्र और निष्पक्ष पत्रकारिता भी खतरे में पड़ जाएगी। अब देखना यह है कि सरकार इस गंभीर मुद्दे पर कब और कितना ठोस कदम उठाती है।
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