भोपाल / (सैफ़ुद्दीन सैफ़ी) कहने को तो मध्य प्रदेश 25 से 26 हजार मेगावाट बिजली पैदा करने की क्षमता विकसित करके सरप्लस बिजली वाला राज्य बन गया है, लेकिन यह पूरी हकीकत नहीं है। इस साल गर्मियों में लोडशेडिंग करके काम चलाना पड़ रहा है। यानी एक क्षेत्र में बिजली सप्लाई जारी रखने के लिए दूसरे हिस्से की बिजली में कटौती करना पड़ रही है। यही तरीका प्रदेश के ग्रामीण क्षेत्रों में हर साल अपनाया जा रहा है। इस साल भी 18 से 24 मई के दरम्यान 8 अन्य तारीखों में ऐसा ही किया गया, तब भयंकर गर्मी थी, जिसके कारण आम जनता को भारी परेशानियों का सामना करना पड़ा। इस साल यह नौबत इसलिए बन रही है क्योंकि गर्मी में बिजली की मांग सामान्य दिनों की तुलना में 2 से 4 हजार मेगावाट बढ़ जाती है, इधर सौलार से मिलने वाली बिजली कम हो जाती है। सामान्य दिनों में 2750 से लेकर तीन हजार मेगावाट तक बिजली मिलती है, जो गर्मियों में कम हो जाती है। बीते सालों में सोलर बिजली को स्टोर करने की क्षमता विकसित नहीं की गई। हाइडल संयंत्रों से करीब एक हजार मेगावाट बिजली पैदा की जा सकती है, लेकिन गर्मी में जल संकट के चलते पानी का इस्तेमाल ज्यादा जरूरी होता है, इसलिए पानी के उपयोग पर रोक रहती है। पवन ऊर्जा भी एक स्त्रोत है, लेकिन यह हवा चलने पर ही निर्भर है। थर्मल पावर प्लांट की क्षमता 14 से 15 हजार मेगावाट की है, इनमें से कुछ प्लांटों की इकाइयां मेंटेनेंस या अचानक तकनीकी खराबी के कारण बंद हो जाती हैं, तो कभी कोयले की दिक्कत रहती है, इस तरह क्षमता के अनुसार बिजली नहीं मिल पाती। बिजली कटौती से हलाकान आम जनता की परेशानी में तब और इजाफा होता है, जब उत्पादनकर्ता विभाग के अधिकारियों को फोन करते हैं तो न कोई फोन रिसीव करता है, न बिजली आने का सही टाइम बताता है। नालों में उतारकर सफाई करने फोटो खिंचवाने वाले ऊर्जा मंत्री भी फोन उठाने की जहमत नही करते
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