नई दिल्ली छात्राओं के बेहतर स्वास्थ्य और सम्मान के लिए सुप्रीम कोर्ट ने दायर जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए बड़ा फैसला सुनाया कोर्ट ने कहा कि मासिक धर्म स्वास्थ्य का अधिकार संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत जीवन और गरिमा के अधिकार में निहित मौलिक अधिकार का हिस्सा है | कोर्ट ने सभी राज्यों व केन्द्र शासित प्रदेशों को निर्देश दिया कि हर स्कूल में छात्राओं को मुफ्त सैनिटरी पैड उपलब्ध कराएं छात्र व छात्रों के लिए अलग – अलग टॉयलेट भी सुनिश्चित करें कोर्ट 3 माह बाद फिर से इस पर सुनवाई करेगा |
जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस आर महादेवन की बेंच ने कहा यह व्यवस्था शहरी और ग्रामीण इलाकों के सभी सरकारी , सहायता प्राप्त और निजी स्कूलों में अनिवार्य होगी उल्लंघन पर निजी स्कूलों की मान्यता रद्द हो सकती है सरकारी स्कूलों में कमी की ज़िम्मेदारी सीधे राज्य सरकार की होगी कोर्ट ने कहा कि इन सुविधाओं की कमी से छात्राओं की गरिमा आहात होती है कोर्ट ने एक स्टडी के हवाले से – 29% छात्राएं मासिक धर्म के दौरान स्कूल नहीं जातीं यह पढ़ाई छूटने की वजह बनता है |
कोर्ट ने कहा सैनिटरी पैड टॉयलेट परिसर में वेंडिंग मशीन के जरिए या स्कूलों में किसी तय जगह या किसी अधिकारी के पास रखे जाएं |
हर स्कूलो में मेंस्ट्रुअल हाइजीन मैनेजमेंट कॉर्नर बनाए जाएं , जहां अतिरिक्त यूनिफॉर्म इनरावियर और डिस्पोजर बैग हों |
टॉयलेट में पानी , प्राइवेसी दिव्यांग बच्चों के अनुकूल व्यवस्था और हाथ धोने के लिए साबुन – पानी अनिवार्य किया गया है | स्कूलों के पाठ्यक्रम में मासिक धर्म किशोरावस्था से जुड़े बदलावों और स्वास्थ्य से जुड़े विषय शामिल किए जाएं |
मेंस्ट्रुअल हेल्थ के बारे में स्कूल स्तर पर संवेदनशीलता विकसित करें सुविधाओं की सूचना विभिन्न मीडिया प्लेटफॉर्म के जरिये दी जाए |
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