भोपाल ( सैफुद्दीन सैफी)
एक तरफ मध्यप्रदेश सरकार कुपोषण मुक्त प्रदेश का लक्ष्य पेश करती है, तो वही
दूसरी और जमीनी आकड़ें इस दावे को चुनौती देते नजर आते है। कुपोषण के खिलाफ लड़ाई पर एक बड़ा सवाल खड़ा हो गया है।कि क्या आठ रुपए प्रतिदिन मे किसी बच्चे को पोषण मिल सकता है।
महंगाई के इस दौर मे जब कि एक गिलास दूध की कीमत 10 से 12 रू॰ है, तब सककार कुपोषित बच्चो के लिए प्रतिदिन मात्र आठ रुपए खर्च कर रही है। यह दर वर्ष 2017 मे तय हुई थी और तब से आज तक इसमे कोई इजाफा नही हुआ है,इसके विपरीत सरकार की वाहवाही दर्शाने के लिए पोस्टरों बैनरोबाजी पर करोड़ों रुपए फूंके जा रहे है।इंदौर ,भोपाल ,जबलपुर और ग्वालियर संभाग के पिछले पाँच साल के आंकड़ो का अध्ययन बताता है कि इन चार बड़े क्षेत्रों मे ही पाँच लाख से ज्यादा बच्चे कुपोषित पाए गए इनमे एक लाख से अधिक बच्चे गंभीर कुपोषण श्रेणी मे है।सब से चिंताजंक पहलू मौतों का है,अनुमान के मुताबिक इन चार संभागों मेंपिछले पाँच सालों मे 3500 से 4600 बच्चो कि मौत कुपोषण से जुड़ी अवस्था मे हुई है। जानकारों का मानना है कि वास्तविक आंकड़े इससे ज्यादा भी हो सकते है।क्यो कि कई मौतों मे वास्तविक कार्न कोपोषण दर्ज नही किया जाता।
जब एक बच्चे के पोषण कि कीमत बाजार मे तीस से चालीस रुपए है तब आठ रुपए में कुपोषण खत्म करने का दावा नीति नहीं व्यवस्था की विफलता का शर्मनाक संकेत है। मध्यप्रदेश से आगे तो केरलम और तमिलनाडु है जहां गंभीरता के साथ 20 से 30 रुपए के करीब बच्चो के पोषण पर खर्च किया जा रहा है।
आवश्यक मानक के हिसाब से बच्चो को पोषण के लिए 15 से 25 ग्राम प्रोटीन 1000 से 1500 केलोरी प्रदीन मिलना चाहिए मगर जमीनी स्तर पर प्रोटीन 8 से ग्राम और कैलोरी 400 से 800 ग्राम मिल रही है, जो कि कोपोषित बच्चो के साथ मध्य सरकार की दरियादिली नही मज़ाक दर्शाता है। जागो जागो मोहन सरकार
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