भोपाल /(सैफ़ुद्दीन सैफ़ी) मध्य प्रदेश सरकार के अधीन कार्यरत संस्थान वीर भारत न्यास गंभीर सवालों के घेरे में है। आरोप है कि यहाँ नियम-कायदों को दरकिनार कर करोड़ों रुपयों के काम सीधे निजी एजेंसियों को सौंपे जा रहे हैं। इस पूरे मामले के केंद्र में जो नाम सामने आ रहा है वह है सेवानिवृत्त अधिकारी श्रीराम तिवारी का, जो सेवानिवृत्ति के बाद भी वीर भारत न्यास में न्यासी सचिव के रूप में प्रभावी भूमिका निभा रहे हैं। वर्तमान में श्रीराम तिवारी मुख्यमंत्री मोहन यादव के सांस्कृतिक सलाहकार भी हैं। आरोप है वीडियो निर्माण जैसे कामों के लिए करोड़ों के प्रोजेक्ट बिना टेंडर प्रक्रिया के सीधे निजी एजेंसियों को सौंप दिए गए और यही कामकाज आज भी बदस्तूर जारी है। इन एजेंसियों में प्रमुख रूप से पीबी प्रोडक्शन, आर्ट एंड व्यू सहित अन्य एजेंसियों के नाम सामने आए हैं। इन एजेंसियों को करोड़ों रु. के वीडियो निर्माण और प्रचार संबंधी कार्य बिना निविदा प्रक्रिया के सौंप दिए गए। सवाल बड़ा सवाल यह है कि जब प्रदेश में पहले से ही वीडियो और प्रचार कार्यों के लिए जनसंपर्क और माध्यम जैसी संस्थाएं मौजूद हैं, जहां यह दर्जनों पंजीकृत एजेंसियां विधिवत ईएमडी जमा कर बड़ा प्रतिस्पर्धा में भाग लेती हैं, तब वीर भारत न्यास को अलग से निजी एजेंसियों को सीधे काम देने की क्या आवश्यकता थी। अपने पद का दुरुपयोग करते हुए सिर्फ अपनी पसंदीदा और चुनिंदा कंपनियों को काम देकर श्रीराम तिवारी ने नियमों का खुला उल्लंघन कर विभाग को करोड़ों रु. का चूना लगाया है। प्रश्न यह भी उठता है कि एक सेवानिवृत्त अधिकारी को इतनी महत्व पूर्ण वित्तीय और प्रशासनिक शक्तियां आखिरकार क्यों और कैसे दी जा रही हैं। सरकार को चाहिए कि इस पूरे मामले की उच्च स्तरीय जांच कराए ताकि स्पष्ट हो सके कि करोड़ों के काम किस आधार पर और किसकी अनुमति से दिए गए। सवाल सीधे उस व्यवस्था पर भी खड़ा होता है जो पारदर्शिता और सुशासन के दावे करती है।
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