भोपाल ( कशिश मालवीय ) जिस अस्पताल को स्वास्थ्य सेवाओं का मॉडल बताकर शहर में वाहवाही लूटी गई , लेकिन हकीकत में वह ऊंची दुकान फीका पकवान साबित हो रहा है अस्पताल के ब्लड बैंक में ब्लड सेपरेशन की सुविधा ठप पड़ गई ब्लड सेपरेशन बंद होने से गंभीर मरीजों की जान खतरे में है अपनों की जान बचाने के लिए परिजन दर – दर भटकने को मजबूर हो रहे हैं | कागजों पर मॉडल की मिसाल बनने वाले राजधानी भोपाल के जेपी अस्पताल में जीवनरक्षक सुविधाओं की बड़ी खामियां सामने आई है सबसे ज्यादा असर उन मरीजों पर पड़ रहा है , जिन्हें खून या उसके कंपोनेट्स – प्लेटलेट्स , प्लाज्मा या रेड ब्लड सेल्स – की जरूरत होती है अस्पताल में अब तक ब्लड सेपरेशन यूनिट शुरू नहीं हो पाई है , जबकि एफरेसिस मशीन भी पूरी क्षमता से काम नहीं कर रही इसका सीधा नुकसान मरीजों को हो रहा है |
एक यूनिट खून से जहां तीन मरीजों की जान बचाई जा सकती है , वहीं यहां पूरा खून एक ही मरीज को चढ़ाना पड़ रहा है डॉक्टरों के अनुसार करीब 70% मरीजों को पूरे खून की नहीं , बल्कि किसी एक कंपोनेंट की जरूरत होती है इसके बावजूद , मजबूरी में होल ब्लड ही देना पड़ रहा है | विशेषज्ञ बताते हैं कि आधुनिक चिकित्सा में कंपोनेंट थेरेपी सबसे प्रभावी मानी जाती है इसमें खून को अलग – अलग हिस्सों में बांटकर जरूरत के हिसाब से मरीज को दिया जाता है उदहरण के तौर पर डेंगू में प्लेटलेट्स , खून की कमी में रेड ब्लड सेल्स और लीवर या जलने के मामलों में प्लाज्मा दिया जाता है इससे इलाज सटीक होता है और एक यूनिट से कई मरीजों को फायदा मिल सकता है |
सुविधा के अभाव में मरीजों के परिजन निजी ब्लड बैंकों का रुख कर रहे हैं , जहां कंपोनेट्स महंगे दामों पर मिलते हैं कई मामलों में समय पर प्लेटलेट्स या प्लाजा न मिलने से मरीजों की हालत गंभीर हो जाती है | जानकारी के मुताबिक , ब्लड सेपरेशन यूनिट के लिए करीब दो साल पहले आवेदन किया गया था , लेकिन अब तक मंजूरी नहीं मिल पाई |
भोपाल सीएमएचओ डॉ. मनीष शर्मा ने कहा सेपरेशन यूनिट के लिए आवेदन दिया हुआ है | हालांकि अब तक इसका लायसेंस नहीं मिला है | ब्लड एफेरेसिस मशीन है , इससे मरीजों को फायदा भी हो रहा है |
अब यह देखना है कि यह मॉडल अस्पताल जनता के लिए सिर्फ एक खाली इमारत बनकर रह जाएगा या प्रशासन अपने साख को बचाने के लिए आगे कदम बढ़ाएगा |
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