भोपाल। ( सैफ़ुद्दीन सैफ़ी) किसी भी प्रदेश की राजधानी उस सूबे का चेहरा होती है। पहली बार बाहर से आने वाला नवा आगंतुक राजधानी का आंकलन होने के बाद समझ जाता है कि प्रदेश की अंदरूनी व्यवस्था और निजाम किस कदर का होगा। कहते हैं भोपाल स्मार्ट सिटी भी कहलाता है, लेकिन यहां ‘स्मार्टनेस’ कहीं भी नजर नहीं आती, न जमीन पर न ही यहां के प्रशासनिक अफसरों में। स्वच्छता, कचरा कलेक्शन, कानून व्यवस्था तथा यातायात, किसी भी मामले में भोपाल राजधानी के मापदंडों पर खरा नहीं उतरता। सबसे बदहाल स्थिति सार्वजनिक परिवहन की है। आलम यह है कि 25 लाख की आबादी वाले भोपाल शहर में केवल 50-60 खटारा बसें ही चल रही हैं जबकि दो साल पहले तक यह संख्या तीन सौ के लगभग थी। भोपाल शायद देश की ऐसी पहली और एकमात्र राजधानी है, जहां सार्वजनिक परिवहन का जिम्मा चार प्राइवेट ऑपरेटरों को सौंपा गया, जिन पर संचालन एजेंसी ‘बीसीएलएल’ का कोई नियंत्रण नहीं है। नाकारा महापौर और बीसीएलएल के गैर जिम्मेदार अफसरों के चलते ऑपरेटरों की मनमानी चरम पर है। अनुदान के करोड़ों रुपए डकारने वाले ऑपरेटरों ने टेंडर की शर्तों के मुताबिक कभी भी बसों की तयशुदा संख्या को सड़कों पर नहीं उतारा, डिपो में खड़ी डेढ़ सौ बसें कंडम हो रही हैं, लेकिन बीसीएलएल और ऑपरेटर कानूनी विवाद में उलझे हैं, नतीजतन हजारों यात्री ‘बेबस’ हैं और ऑटो रिक्शा वालों की दादागिरी, मनमर्जी का किराए वसूली के शिकार हो रहे हैं। जब तेजतर्रार समझी जाने वाली आईएएस संस्कृति जैन ने नगर निगम आयुक्त का पदभार संभाला था तो राजधानीवासियों को उम्मीद बंधी थी कि शायद परिवहन व्यवस्था में कुछ सुधार होगा, लेकिन उनकी सख्ती भी सिटी-बसों वाले बेईमान अधिकारियों एवं ऑपरेटरों के आगे काम नहीं करती। उधर महापौर की अपनी बसें चल रही हैं, सिवाय उनका हजारों बेबस’ यात्रियों से कोई लेना देना नहीं है। शहर में एक स्थान से दूसरे स्थान तक जाने के लिए लोगों को दो-तीन बार वाहन बदलना पड़ रहा है। नगर की प्रथम नागरिक कहलाने वाली महापौर को राजधानी वासियों की दिक्कतों से कोई सरोकार नही है इसका खामियाजा आने वाले वर्षों में नगरनिगम चुनाव में भाजपा को भारी पड़ सकता है।
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