भोपाल ( सैफुद्दीन सैफी ) मध्यप्रदेश में मौत के आंकड़े की फाइलों में एक ऐसा ब्लैक होल है जो राज्य की पूरी स्वास्थ्य व्यवस्था को निगल रहा है प्रदेश में होने वाली हर 100 मौतों में से 90 मौतों के सटीक कारण सरकारी दस्तावेजों से गायब हैं जब यही नहीं पता होगा कि अधिकांश मौतें किस बीमारी से हो रही हैं तो सरकार रिसर्च प्लानिंग और रोकथाम का ढांचा कैसे तैयार करेगी | यही बड़ा सवाल है मेडिकल सर्टिफिकेशन ऑफ कॉज़ ऑफ डेथ 2022 की हाल में जारी रिपोर्ट के अनुसार प्रदेश में कुल पंजीकृत मौतों में से सिर्फ 9.4% मामलों में ही डॉक्टर ने प्रमाणित किया कि मौत किस बीमारी से हुई इस आधार पर एमपी देश में 33वें स्थान पर है गोवा में यह आंकड़ा 100 प्रतिशत तक है हालांकि मप्र में अब तक हदयघात से मौत के सबसे ज्यादा मेडिकल सर्टिफिकेट जारी हुए हैं |
दूसरे नंबर पर निमोनिया और अस्थमा तीसरे पर टीबी और चौथे पर डायबिटीज लिखा हुआ है लेकिन मौत का असली कारण यह नहीं है | नियम यह है कि मेडिकल सर्टिफिकेट में हदयघात की जगह एक्यूरेट वजह लिखी जाए बावजूद डॉक्टर जल्दबाज़ी में पूरा कारण नहीं लिखते राष्ट्रीय स्तर पर रिपोर्ट बताती है कि मौत का सबसे बड़ा कारण संचारी तंत्र की बीमारियां ( 40.8 %) यानी हार्ट डीसीज हैं लेकिन एमपी में कम सर्टिफिकेशन के कारण बीमारी वार सटीक तस्वीर अधूरी रह जाती है |
अगर ये स्पष्ट न हो कि कैंसर से ज्यादा मौतें हो रही हैं या हदय रोग से तो बजट आवंटन दवा खरीद , विशेष डॉक्टरों की तैनाती और रोकथाम कार्यक्रम कैसे तय होंगे मान लीजिए कहीं डायबिटीज से मौतें तेजी से बढ़ीं पर सर्टिफिकेशन न हो तो ट्रेंड पकड़ में ही नहीं आएगा महामारी या संक्रामण के संकेत भी छूट सकते हैं | नियम यह है कि सर्टिफिकेट में हरदायघात की जगह इमीडिएट कार्डियक अरेस्ट , कोरोनरी आर्टरी ड़ीसीज में इनफैक्शन जैसी एक्यूरेट वजह लिखी जाए |
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