भोपाल: ( नेहा शेख ) राजधानी भोपाल में खनिज संपदा की निगरानी और अवैध उत्खनन पर नकेल कसने का जिम्मा संभाल रहे महकमे की पोल खुलकर सामने आ गई है। स्थिति यह है कि जिले के लगभग 60 किलोमीटर के बड़े दायरे में फैली करीब 95 सक्रिय खदाने, 180 स्टीन क्रेशर और 250 से ज्यादा डंपरो पर नजर रखने कि ज़िम्मेदारी सिर्फ एक ही सहायक माइनिंग ऑफिसर के कंधो पर टिकी हुई है।
स्टाफ की भारी किल्लत: भोपाल जिले के खनिज विभाग में माइनिंग अधिकारियों के कुल चार स्वीकृत पद खाली पड़े हैं। इसके अलावा, दो सहायक माइनिंग अफसरों में से एक पद खाली है, सिपाही का पद भी रिक्त है, और होमगार्ड के छह स्वीकृत पदों में से चार खाली चल रहे हैं। वर्तमान में जिला खनिज अधिकारी के रूप में एमएस रावत और सहायक माइनिंग ऑफिसर के तौर पर मुकेश सिंह अपनी सेवाएं दे रहे हैं। जिला खनिज अधिकारी का पद खाली होने के चलते यह अतिरिक्त प्रभार फिलहाल जिला पंचायत सीईओ के पास है।
दूरी और क्षेत्र की चुनौती: शहर में होशंगाबाद रोड से हर दिन करीब 250 डंपर रेत लेकर दाखिल होते है। इनमें ओवरलोडिंग की शिकायतें लगातार मिलती रहती है। चुकीं जांच का दायरा करीब 60 किलोमीटर तक फैला हुआ है इसलिए अकेले अधिकारी के लिए हर जगह लगातार निगरानी करना बहुत मुश्किल साबित हो रहा हैं। इस मैदानी अमले की कमी का सीधा फायदा उठाकर खनन माफिया बैरसिया रोड, नीलबड़ और रातिबड़ जैसे इलंकों में धड़ल्ले से मुरम, गिट्टी और पत्थरो का अवैध परिवहन कर रहे है। हालांकि समय-समय पर प्रशासन की और से वाहन जब्त भी किए जाते हैं।
अधिकारियों को धमकिया: मैदानी स्तर पर जांच के दौरान कर्मचारियों को भारी विरोध का सामना करना पड़ता हैं। अकेला वाहन रोकने पर डंपर चालक रोके नहीं मानते और कई बार स्थानीय विधायकों या रसुखदार अधिकारियों का हवाला देकर फोन पर डराने धमकाने का प्रयास करते है। पिछले एक साल से ओवरलोडिंग और अवैध परिवहन कों रोकने के दावे तो तमाम प्रशासनिक स्तर पर माइनिंग महकमे की कार्यप्रणाली और उसकी सख्ती पर गंभीर सवाल खड़े हो रहे है।
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