भोपाल / इंदौर मध्यप्रदेश के इंदौर के भागीरथपुरा इलाके में दूषित पानी पीने से कई लोगों की मौत हुई थी लेकिन अब यह आंकड़ा 18 तक पहुंच गया है लेकिन इस पूरी घटना ने व्यवस्था की असंवेदनशीलता की पोलखोल कर रख दी है। शुरुआत में नगर निगम ने दूषित पानी से मौतों से इनकार किया था बाद में हाई कोर्ट में इंदौर नगर निगम ने अधिकतम 6 मौतों स्वीकार कीं | इसके बावजूद अब इंदौर कलेक्टर की ओर से 18 परिवारों को 2 – 2 लाख रुपए का मुआवजा बांटा गया है ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब आधिकारिक तौर पर 6 मौतें ही मानी गई तो मुआवजा 18 परिवारों को कैसे दिया गया यहीं नहीं इस गंभीर संकट में भी प्रशासन की मदद सीमित ही रही देश भर में मुआवजे का एक स्थापित पैटर्न है जब सड़क हादसों में ज्यादा लोगों की मौत होती है या प्राकृतिक आपदा में जान जाती है तो सरकार खुद आगे आकर 4 लाख से 10 लाख रुपए प्रति मृतक तक की राहत घोषित करती है लेकिन भागीरथपुरा में जान की कीमत सिर्फ 2 – 2 लाख क्यों तय की गई ? जबकि मामला सीधे पेयजल व्यवस्था , नगर निगम और प्रशासनिक सिस्टम की चूक से जुड़ा है इंदौर कलेक्टर शिवम वर्मा के अनुसार , सीएम डॉ. मोहन यादव के निर्देश पर यह राशि दी गई है |
मौतों के अलग – अलग आंकड़ों को लेकर बुधवार को सीएम डॉ. मोहन यादव ने कहा – मौतों का निर्धारण डॉक्टरी जांच व पोस्टमार्टम रिपोर्ट के आधार पर होता है सरकार ने संवेदनशीलता दिखाते हुए सभी प्रभावित परिवारों को मुआवजा दिया है आंकड़ों से ज्यादा सरकार का फोकस पीड़ितों की मदद और राहत पर है |
महामारी जैसी स्थिति माना उसी आधार पर काम शुरू किया गया मरीजों की संख्या घटते ही अगले दिन आउटब्रेक यानी प्रकोप की श्रेणी में रख दिया गया ऐसे में सवाल है कि अगर यह महामारी जैसे स्थिति थी तो मुआवजा आपदा के स्तर का क्यों नहीं दिया गया ? इसके अलावा जवाबदेही तय क्यों नहीं की गई ? सिस्टम की चूक से 18 जान की कीमत 2-2 लाख रुपए देने से क्या सरकार की ज़िम्मेदारी पूरी हो गई है लेकिन इन मौतों के लिए ज़िम्मेदारी अब तक तय नहीं हुई है |
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