मोहन सरकार तय करें कि वो जनता के साथ है या
भोपाल( सैफ़ुद्दीन सैफ़ी)
सरकारी वित्त वर्ष बदलने के बाद हर साल की तरह इस बार भी प्रदेश की शराब दुकानों के ठेके देने का क्रम शुरू हुआ।
बेशुमार कर्ज के बोझ तले दबी मध्यप्रदेश की मोहन सरकार के लिए शराब राजस्व का सबसे बड़ा जरिया है,लिहाजा कीमतें बड़ा कर दूकानों की नीलामी की गई। जब देखा गया कि बड़ी हुई कीमतों पर ठेकेदार आगे नही आ रहे है तो उन्हें कम कर ठेके दिए गए फिर भी खजाने को लाभ हुआ।
ठेको के बाद शराब दूकानों को लेकर राजधानी से छोटे कस्बो तक जो उबाल दिख रहा है,वह सिर्फ विरोध नही बल्कि व्यवस्था के खिलाफ उभरता अविश्वाश है। सड़को पर उतरी महिलाएं केवल एक दुकान का विरोध नही कर रही वो उस सोच को चुनोती दे रही है जिसमे राजस्व का दर्जा समाज से बड़ा हो गया है। सरकारी नीति और सिस्टम की नीयत पर धंधे का नशा चढ़ चुका है। नीति कहती है कि मंदिर ,स्कूल और नेशनल हाईवे की दूरी तय है पर हकीकत में नीति की आत्मा का ऐसा निचोड़ है कि हर आपत्ति बेमानी हो जाए और हर विरोध नियमो की खामी में दबा दिए जाएं सबसे बड़ा सवाल ये है कि क्या वे मंदिर नही है जिसे सरकार अधिसूचित न करें? क्या आस्था को भी सरकारी मोहर की जरूरत है। अगर किसी एक मोहल्ले का मंदिर सरकारी सूची में नही है तो क्या वो मंदिर नही रहा? यह सिर्फ कानूनी पेंच नही संवेदनहीनता की हद है। और भक्ति का दिखावा करने वाले नेता चुप है।
भोपाल में मंदिर और शैक्षणिक संस्थान के सामने खुले ठेकों को लेकर उबाल है लेकिन जियो टॉपिंग के इस दौर में आबकारी अमला फीता टेप से आंखों में धूल झोंक रहा है।
हद तो ये है कि सीएम आवास के रास्ते मे एक संस्थान के पास शराब दुकान के खिलाफ उतरे छात्रों की पुलिस से भिडंत हुई और पथराव में पुलिसकर्मी घायल हो गए।दिनभर के सन्नाटे के बाद ठेका खुला और वही महफ़िल जम गई।असलियत ये है कि ये नीति नही नियत का मामला है। शराब सामाजिक चुनोती नही बल्कि खजाना अहम है और नियम बौने हो गए है शराब ठेकेदार सत्ता की छत्र छाया में ताकतवर हो गए है क्यों की प्रशासन कवच बना हुआ है। राजधानी जहाँ सरकार बैठी है वहाँ महिलाएं लाठी लेकर सड़क पर बैठने पर मजबूर है, ये किसी भी सभ्य समाज के लिये शर्मनाक है सरकार को तय करना होगा कि वह जनता के साथ है या सिर्फ अपने खजाने के साथ।
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