भोपाल। (सैफ़ुद्दीन सैफ़ी) शिक्षा को लेकर दो बातें प्राचीनता से कही जाती हैं। “विद्या ददाति विनयम” यानी शिक्षा विनम्र सिखाती है, और “तमसो मा ज्योतिर्गमय” अर्थात अंधकार से प्रकाश की ओर ले जाने वाली। यदि व्यक्ति उच्च शिक्षा प्राप्त है तो सोने में सुहागा। प्रदेश के मुख्य मंत्री डॉ. मोहन यादव भले ही पर्ची के जरिए सत्ता की कुर्सी तक पहुंचे हों, मगर वे उच्च शिक्षा प्राप्त हैं, उनके नाम के साथ डॉक्टर जुड़ा है। राजनीति को “दलबदल” की संज्ञा भी दी गई है, यदि इसमें ज्ञानवान व्यक्ति शामिल होता है तो सत्ता का मद उसे इतना मदहोश कर देता है कि सारा ज्ञान कूड़ा-कर्कट हो जाता है ।मोहन यादव के साथ यही हो रहा है। दिल्ली में विराजित अपने आकाओं के नक्शे कदम पर चलते हुए मोहन यादव भी मंच से कांग्रेस और उसके नेताओं को कोसने में कोई गुरेज नहीं करते, फिर वह मंच चाहे राजनीति का हो, धार्मिक हो, सांस्कृतिक हो अथवा सामाजिक हो। प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष जीतू पटवारी ने इन्हें ‘अभिनंदन लाल‘ क्या कह दिया कि वे अपना आपा खो बैठे और शुजालपुर की जनसभा मैं जीतू को ‘टपोरी’ लाल तथा दो कौड़ीका प्रदेश अध्यक्ष कह गए। संवैधानिक पद पर बैठे शख्स को शासन करने का अधिकार तो है लेकिन किसी विपक्षी नेता का आकलन कौड़ियों में करने का अधिकार नहीं है। किसकी औकात कितनी कौड़ियों की है, इसका फैसला जनता ही करेगी। वैसे भी मोहन यादव की बॉडी लेंग्वेज यह दर्शाती है कि वे सत्ता के मद में ‘आत्म मुग्ध’ हैं। सत्ता का क्या है, आज है कल नहीं।” सत्ता नहीं जागीर किसी की सब है यहां चौकीदार ।कुछ तो आकर चले गए कुछ जाने को तैयार हो सकता है अगले चुनाव में सत्ता की पर्ची किसी और के नाम निकल आये ठीक भी है जिसकी कैबिनेट में आधा दर्जन मंत्री बदजुबान हो अमर्यादित भाषा बोलते हो उसका मुखिया भी वही भाषा बोलने लगें तो हैरान नही होना चाहिए मोहन यादव को एक नसीहत है — शोहरत की फिजाओं में इतना न उड़ो मोहन ,परवाज न खो जाए कहीं ऊंची उड़ानों में ।
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