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सवाल उठता हैं कि क्या ? एंबुलेंस कंपनी को लोगों की जान बचाने से अधिक फ्यूल बचाने की चिंता है……


भोपाल ( कशिश मालवीय ) प्रदेश में जीवनदायिनी मानी जाने वाली आपातकालीन स्वास्थ्य सेवा 108 एंबुलेंस के ड्राइवर को 50 से ज्यादा की स्पीड पर गाड़ी दौड़ाने की अनुमति नहीं है। ,क्योंकि गाड़ी का माइलेज 13.5 किमी / लीटर देना होता है यही कारण है कि डीजल बचाने और एवरेज निकालने के लिए एंबुलेंस चालक मजबूरन गाड़ियों को धीमी रफ्तार से चला रहे जिससे गंभीर मरीजों को समय पर अस्पताल तक पहुंचाना मुश्किल हो रहा है

प्रदेश में आपातकालीन स्वास्थ्य सेवा 108 एंबुलेंस इसलिए शुरू की गई थी कि गंभीर मरीजों – घायलों को कम से कम समय में अस्पतालों तक पहुंचाया जा सके एंबुलेंस सेवा पर छोटे शहरों से गंभीर मरीजों को बड़े शहरों के अस्पताल तक कम समय में पहुंचने की ज़िम्मेदारी भी है | लेकिन ऐसा नहीं हो रहा है सागर से भोपाल तक 180 किमी का सफर एंबुलेंस 3 घंटे के बजाय छह घंटे से भी अधिक समय में तय कर रही है |

छोटे शहरों से मरीज को भोपाल लाने में एंबुलेंस बस से भी अधिक समय ले रही है सागर से भोपाल तक आने में बस 2 स्टॉप पर रुकती हुए साढ़े तीन से 4 घंटे तक का समय लगता है वहीं एंबुलेंस यह दूरी बिना रुके छह घंटे से भी अधिक समय में तय कर रही है | मरीज की हालत कितनी ही गंभीर क्यों न हो लेकिन एंबुलेंस की स्पीड बढ़ाने के लिए ड्राइवर को कंपनी से अप्रूवल लेना होता है मरीज के परिजन तेज गाड़ी चलाने के लिए कितना भी दबाव बनाएं लेकिन कंपनी से अनुमति मिले बिना ड्राइवर एंबुलेंस की रफ्तार नहीं बढ़ाते हैं |

इधर , एंबुलेंस कंपनी के अफसरों का कहना है कि एंबुलेंस चलाते समय चालक पर माइलेज पाने का कोई दबाव नहीं रहता चालक को सिर्फ लापरवाही से गाड़ी चलाने के लिए मना किया जाता है मरीज की स्थिति के अनुसार वह तेज गाड़ी चला सकता है | प्रदेश की एंबुलेंस की रफ्तार लोकल बस से भी कम है एंबुलेंस संचालित करने वाली एजेंसी को मरीजों की जान से ज्यादा पेट्रोल – डीजल बचाने की चिंता है |

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